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Tuesday, April 8, 2014

जल रहा हु

 तेरी ही यादों को लगातार लिख रहा हूँ मैं 
जो भी हूँ जैसा भी हूँ सरे बाज़ार बिक रहा हूँ मैं 

कहते थे जो कभी मुझ को एक ही अपना 
आज उनकी ही आँखों में नहीं दिख रहा हूँ मैं 

आभाव हो गया हो जैसे प्रेम का हर ओर
बस घृणा की अंगीठी में सिक रहा हूँ मैं

यूं तो कुछ जान बाकी है अभी मुझमे मगर
फिर भी हर रोज एक नयी अर्थी पर चढ़ रहा हूँ मैं

कोई तो दिखा दे मुझे सूरज उम्मीदों का
उसी की खोज में दिन रात जल रहा हूँ मैं 

मेरे नेता तू ही महान है

मेरे देश की निराली ही शान है
तभी तो कहते है हम मेरा भारत महान है

सौपी राखी चोरों के हाथ में कमान है
तभी तो इसकी हर एक शाखा बीमार है

कर रहे है बन के हकीम इलाज इसका वो
जिनकी तो पूरी की पूरी नसल बीमार है

भ्रष्टाचार के रोग से ग्रसित है ये खुद
और कहने को इनके पास हर रोग का निदान है

आजाते है हर पांच साल पर चेहरा वही लिये
चोला बदल रहे इतना की दरजी परेशान है

वादों की हर गोलियो से लेस है ये सभी
हर बार सजती नयी सी इनकी दुकान है

चट कर रहे है देश को ये कुछ इस तरह
की इनके सामने तो लगता दीमक भी नादान है

सत्ता की हनक में छुपा लिये है चेहरे असली
सच है रे भारत के नेता तेरी अलग ही पहचान है

अब लगता है बदल दू इस कथन को मैं
और कहू की सच में बस मेरे नेता तू ही महान है
 — 

तेरा नाम

दीवारों पर लिखकर आज भी तेरा नाम मिटाया करता हूँ,
तन्हाई को अपनी हर बात बताया करता हूँ.

तेरे उन्ही प्रेम गीत को बस मैं गुनगुनाया करता हूँ ,
जब भी होता हूँ तन्हा बस में गाया करता हूँ.

अब बस साथ यही है मेरे ,वीरानी सी रातों में 
तुम्हारी ही यादो से दिल को बहलाया करता हूँ.

वो वफ़ा की कसमे जो खायी थी हम दोनों ने ,
बस याद कर उन्हें ही मैं मुस्कुराया करता हूँ

दीवारों पर लिखकर आज भी तेरा नाम मिटाया करता हूँ,...

अभिषेक

वो अजनबी

बरसो बाद आज वो अजनबी अपना सा लगा ,
शुरू हुआ बातों का सिलसिला आज बड़ी देर तक चला ।
प्यार से जब उसने समझाया तो कठिन रास्ता भी आसान सा लगा ,
उसकी डाट का अंदाज़ भी आज मीठा सा लगा 
उसकी मस्ती दिल में उड़ने का अरमान जगा गयी ,
उसकी आखों की शरारत जाने क्या-क्या कह गयी 
उसका रूठना और फिर मान जाना प्यारा सा लगा ,
उसकी फ़ालतू बातों को सीरिअस लेना अच्छा लगा ।
उसकी ख़ामोशी भी ना जाने कितना कुछ कह गयी ,
और कभी बातें भी उसकी ख़ामोशी को बयान कर गयी
इतना सब जानते हुए भी वो अजनबी सा लगा ,
उसका हर एक पल एक नया राज़ खोल गया
फिर भी उस अजनबी का साथ आज अच्छा सा लगा है ।

जीवनसाथी

जीवन साथी, हमसफ़र या फिर कुछ और कहो, हमारे जीवन के साथी के बहुत सारे नाम होते है! ये एक ऐसा रिश्ता होता है जो सिर्फ हमारा साथ देने के लिए ही बनाया गया होता है! एक ऐसा रिश्ता जो हमारा आईना होता है, जो हर कदम पर, हर परिस्थिति में हमारा साथ देता है, हमें संभालता है या यूँ कहू की वो हमारी आत्मा से जुड़ा होता है!

ये ज़िन्दगी भी कितनी अजीब पहेली होती है , वैसे तो हमें हमारे सारे रिश्ते ( मम्मी, पापा, भाई, बहन......) पैदा होने के साथ ही मिल जाते है पर जिसके लिए या फिर जिसके साथ हमें अपनी पूरी ज़िन्दगी बितानी होती है उसके बारे में ही हमें कुछ पता नहीं होता है, बस सपने ही सजाते रहते है की वो ऐसा होगा/होगी, वैसा होगा/होगी, उसके साथ ऐसे जीएगे वैसे जीएगे ..... जिसके साथ हमारी सारी आशाए और खुशियाँ जुडी होती है उसे पाने और जानने के लिए हमे अपनी आधी ज़िन्दगी का लम्बा इंतज़ार करना पड़ता है !

हर इंसान यही ही चाहता है की उसका साथी उससे बहुत प्यार करे, उसकी हर ख्वाइश और परेशानियाँ उसके कहे बिना ही उसकी आँखों में पढ़ ले .......... अगर वो परेशान हो तो वो बड़े ही प्यार से अपने दोनों हाथो से उसका चेहरा थाम कर बोले ," परेशान मत हो मै हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगा/रहूँगी!".......... जब भी कभी आपकी तबियत ख़राब हो तो आपका सर अपने गोद में रखे और अपने एक हाथ से आपका हाथ पकडे और दुसरे हाथ आपके सर पर रखे और बोले" मै हमेशा तुम्हारा ख्याल रखूँगा/रखूंगी!".... अगर आपसे कभी कोई गलती हो जाए तो वो बड़े ही प्यार से मुस्कुराकर बोले " कोई बात नहीं गलतियाँ इन्सान से ही होती है!" एक ऐसा साथी जिसकी ख़ुशी ही आपकी ख़ुशी बन जाए! जो दूर होकर भी हमेशा आपके साथ रहता/रहती हो, जिसके बिना हर ख़ुशी बेमानी हो जाये!

कितने खुशनसीब होते है वो लोग जिन्हें उनका मनपसंद जीवन साथी मिल जाता है जबकि कुछ लोगो के सपने सिर्फ सपने ही बन कर रह जाते है! लेकिन मुझे सबसे ज्यादा तरस और दुःख उन बदनसीब लोगो पे आता है जिन्हें जीवन साथी तो उनकी पसंद का मिलता/मिलती है पर वो अपनी नासमझी और नादानी से उन्हें खो देते है और फिर जीवन भर पछताते रहते है! ऐसे लोग ये नहीं सोच पाते की वो ल़ोग कितने भाग्यशाली होते है, वरना कितने ही ऐसे लोग है जो किसी न किसी वजह से, चाहे वो समाज के कारण या परिवार के कारण या फिर एक तरफ़ा प्यार होने के कारण उसे 
खो देते है जिससे वो बेइएन्तेहा प्यार करते है!

कुछ ल़ोग का मानना है की शादी एक फंदा है जिसमे बंधकर उनकी ज़िन्दगी ख़राब हो जाती है! शायद उनकी ये सोच इसलिए ऐसी हो गयी है क्योकि हमारे समाज में कुछ घटिया लोगो ने इस "पवित्र रिश्ता" के ऐसे गंदे उदाहरण सामने रखे है जिससे कुछ ल़ोग या हम सभी ल़ोग अपने जीवन साथी को पाने और जानने से पहले इस रिश्ते में बंधने से डरते है!

लेकिन हमें खुद ही ये समझना चाहिए की अपने रिश्ते में खुशियाँ बनाये रखने के लिए उसे हमें किस तरह से उसे निभाना चाहिए! अगर हमें अपने साथी से कुछ आशये है तो उसकी भी तो कुछ आशये हमसे जुडी होती है, जिसे हमें भी पूरी करनी चाहिए! हमें हमेशा अपनी खुशियों को ही नहीं मनवानी चाहिए बल्कि उसकी खुशियों में ही अपनी खुशिया ढूंढनी चाहिए!

"प्यार और विश्वास" इस रिश्ते की सबसे गहरी नीव होती है! अगर ये दो चीज़ हम अपने रिश्ते में बनाये रखे तो कभी कोई परेशानी नहीं आएगी!

असमंजस

दर्पण पे जमी हो धूल तो श्रृंगार कैसे हो
जब तक है भूखा आदमी तो प्यार कैसे हो 


पढ़ लिख कर सब बन गए शहर में दफ्तर के बाबू 
खेतों में अनाज की अब पैदावार कैसे हो 


मंहगाई को जिद ही है अब छूने को आसमां
गरीबों के घर तीज और त्यौहार कैसे हो


मतलब नहीं है देश के आदमी को देश से
राम जाने इस देश का बेड़ा पार कैसे हो


ले चल अब मुझे दूर कहीं मुर्दों के शहर से
मुर्दों के शहर में कविता का कारोबार कैसे हो

कविता

कवितायें कभी लिखी नहीं जाती 
वह तो जन्म लेतीं हैं 
उस भूख से 
जो मन के किसी 
कोने में दबी हुई 
कोई अतृप्त 
इच्छा है 
या यह कोई 
ऐसी भूख है जो 
कहीं पनप रही है 
आहिस्ता आहिस्ता
और उनको शांत करने का
कोई माध्यम
कहीं कोई
नजर नहीं आता
वह फिर कलम से
बहती है आतुरता से
और कहती अपनी बात
उन अनकही
इच्छाओं से जो
अपनी बात कहने का
स्खलित होने का माध्यम
तलाश कर लेती हैं
अपने ही किसी मन के द्वार से
पर रह जाती हैं
फिर भी अतृप्त सी
और फिर उसको
कोई शैतान कोई खुराफात
कोई प्रेम आदि आदि
के लफ़्ज़ों में ढाल कर
अपनी बात कह देते हैं
और..........
वही लिखा हुआ
फिर कविता कहलाता है

बदलाव

न उसकी अदा और न उसका ये शहर बदला 
कुछ बदला है तो बस 'अभी' बस मेरा ही ठिकाना बदला 

मत हो तू उदास और तन्हा इस कदर ये शराबी मन 
जाम तो वाही बस बदला है तो महखाना बदला 

हम आज भी जैसे खड़े थे उसी आयाम पे
छोड़ हमें बाकि सारा जमाना बदला

लिखने का तेवर आज भी वही है मेरा
बस बदला है तो मेरे लफ्जो का ठिकाना बदला

दो घडी भी नहीं रुक पाया तू मेरे लिये ए वक़्त
आज मेरे हिस्से में तेरा पैमाना बदला

शाम की दहलीज़ में आज भी ठहर जाते है कदम मेरे
शायद अब तो उनकी मसरुफियातो का फ़साना बदला


अभिषेक 

काश मैं सौदागर होता

काश मैं सौदागर होता तो चाँद की चाँदनी
ले आता गठरी में बांध और देता सबको बाँट
लम्हा-लम्हा जिंदगी न गुजरती यूं प्यासी सी
काश कही सच होते सपनो का सागर होता
तो ले आता मैं भर नीर उसका
और उधेल देता जीवन में सबके
काश मैं सौदागर .......

प्रेम

आज फिर किसी से प्यार कर बैठे हम 
शायद फिर ये ऐतराम कर बैठे हम 
फिर से जीने लगे उन पलों को 
जिनसे बहुत दूर हो गए थे हम
छोटी छोटी खुशियों में फिर 
जीने की वजह ढूढने लगे हम 
फिर किसी से प्यार करने लगे हम

बटवारा

चलो आज जहां बांट लें
तुम मेरे, बाकी सब तुम्हारा
तुम्हारी हंसी मेरी और
जहांभर की खुशियां
तुम समेट लेना
तम्हारी इच्छाएं मेरी,
दुनिया भर की चाहतें
तुम पूरी कर लेना
तुम्हारें सपने मेरे
बाकी नींद तुम रख लेना

क्या मैं तेरा नाम लिखू

तुझे रात लिखू या शाम लिखू 
आखिर क्या मैं तेरा नाम लिखू 

अपने दिल के सारे अरमान लिखू
हर बार लिखू बार बार लिखू 

सोच के फिर पड़ गया मैं विस्मय में
की हृदय की इस पुस्तक में कैसे तेरा अध्याय लिखू

शब्दों के खालीपन में भी इस जीवन की
उलझन में भी अंतिम मैं एक मक़ाम लिखू

आखिर क्या मैं तेरा नाम लिखू
तुझे शाम लिखू या रात लिखू

बहुत कुछ लिखना है ..

बहुत कुछ लिखना है ..
शब्द गुम हैं मेरे..
सर्दी की धुप में ...
दोस्ती की चुप्पी में..
दिवाली जैसे उत्सव के मेले में...
अपने कमरे के अकेलेपन में .
घर की सफाई में...
बच्चो की पढाई में...
फिर भी मुझे बहुत कुछ लिखना है.............

रात के अँधेरे पर..
सुबह की किरणों पर..
सुरमई शाम पर...
अलसाई दोपहर पर..
फिर भी मुझे बहुत कुछ लिखना है......

उसकी प्यार भरी बातों पर..
उसके गुस्से भरी आँखों पर..
खुद की परेशान जिंदगी पर..
मेरी हंसती बंदगी पर..
फिर भी मुझे बहुत कुछ लिखना है...

वो मधुमास की यादें
वो फ़ोन पर की हुई खुसफुसाहट
वो लम्बे खतो की बयानी...
बिना बोले तेरे मेरे लबो की कहानी..
फिर भी मुझे बहुत कुछ लिखना है ....

कैसे लिखूं...
जब वक़्त होता है ..
तब तेरे प्यार की चादर..
ओढ़ कर सो जाती हूँ खयालो में..
जब ख्याल होते हैं...
तो फुर्सत ही नहीं होती सजन...
पर फिर भी मुझे बहुत कुछ लिखना है..

अहसास

रात दहलीज़ पे आकर फिर दगा दे गयी
लौट गयी फिर तन्हाई का दामन थमा हमें

अधूरे अहसास प्रेम के जगा वो हसीन शातिर 
दफ़न फिर कर गयी कब्र ए महोबत में हमें

कोई दिल तोड़ ता तो माफ़ भी कर देते हम उसको
वो कातिल तो निकाल के साथ दिल ही ले गयी

आंसू भी अब कहा से निकले इस वीरान जमीं से
अहसास वरखा का अपने साथ ले बंज़र कर गयी हमें


तौबा अब करे भी तो हम अब किस जुबान से
अलफ़ाज़ साथ ले बेजुबान फिर कर गयी हमें

Friday, March 28, 2014

'' अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता ‘

मैं कोई बादशाह नहीं न कोई अति विशिट मैं तो हूँ वही बस साधारण सा सदा गोल मटोल छोटा जिसकी जात का भी आज तक कोई पता नहीं बस एक कहावत है मेरे बारे जो शायद आपने भी सुनी होगी सच मानिये जब से मैंने सुनी पहले तो बड़ा गर्व हुआ पर जैसे जैसे ये प्रचलित हो मुझे पता चला इस  कहावत से मैं फेमस नहीं बल्कि बदनाम हो गया  '' अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता ‘  अब तो समझ जाओ मैं कौन हूँ अरे मैं वही चना हूँ जो बस इस निराशावादी कहावत में फास के रह गया निराशा वादी इस लिये क्यों जब भी किसी के क्रांति कारी  मन ने हिचकोले खाने की सोची उसको यही कह से दबा दिया गया 
 और जिन होने  अपने अन्दर  के चने को को दबा दिया उन्होंने अकेले ही भाड़ फोड़ के दिखा दी  वो भी बड़ी बड़ी। . 
  इसके अलावा भी मुझे बहुत से ताने मिलते है जैसे मैं भी कोई खाने की चीज़ हु मुझे तो घोड़े खाते है 
अरे वो घोडा है जो मुझे खा कर आज आज जानवर है अगर नहीं खाता तो शायद मानव बन गया होता बच गया बिचारा मुझे खा कर और मुझे गर्व महसूस करा गया की मैंने भी किसी की जिन्दगी बचा ली 

कितनी बार कर भ्रष्टाचारियो  की की मैं जिंदगी बचा ली जब भी कोई क्रांति कारी मन उनकी खिलाफत करने को खड़ा हुआ बाद यही कह के दबा दिया गया अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता
अरे मैं बहुत सम्मनिये हु उनकी बिरादरी में बस मेरी पूजा नहीं करते आगे वो भी होगी वक़्त तो आता। ही दिख रहा है 
 मेरे अच्छे दिन और एक सच्चे मनुष्य के और बद्दतर दिन मगर मैं कहा से जिम्मेदार हु उनकी किस हालत का अरे बस कहावत है मुझ पे मैंने कोई थोड़ी कहा है उनसे की सुनो इसको। 

अगर मेरी मनो तो  ‘’ अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता ‘’ एक निराशावादी-गैरजिम्मेदार कहावत है जिसे पूर्वजों ने शायद परीक्षण-उपकरण की तरह उन लोगों की पहचान करने के लिए बनाया जो या तो जिम्मेदारी से दूर भागने का सम्मानजनक रास्ता ढूँढते हैं या फिर जो हुआ उस पर एक मखमली चादर डाल कर पूर्णाहुति का प्रयास करने को जिम्मेदारी-निर्वहन मानते हैं , पर भाई ज़िंदा इंसानों की भीड़ है ये कोई ‘’ गोभी का खेत ’’ नहीं की जो बोलो सो सत्य  |
भाड़ तो अकेला चना ही फोड़ता है और जो चने भाड़ नहीं फोड़ पाते उनका हश्र उदरस्थ होना ही होता …। 

Friday, March 7, 2014

विरह ...!!

मैं स्मृतियों के कोहरे को हटा कर देखता हूँ 
कही सूरज ही दिख जाये प्रेम का तेरा 
मगर ये विरह के बादल बरसने के बाद भी 
तेरे हदय गगन का दामन थम कर बैठे है जैसे

कही एक ही दिख जाये मुझे किरण प्रेम सूर्य की 
जिस के ही सहारे से कुछ अगन ही लग जाये इस तन मैं 
जो तन शुन्य हो गया विरह की इस गलन से 
सिहरन बड़ने सी लगी सी इस गर्मी के मौसम में 

मैं मृत्य समतुल्य सा एक निष्तेज पड़ा हूँ 
कही खो गयी है जो चेतना इस जीवन की 
उसे अब कैसे लाऊ वापस मैं इस आंगन में 
वही कर दे कुछ उजाला एक अँधेरे जीवन में 

ये स्मृतियों के कोहरे भी तो बढाने लगे है 
हर ओर बस एक धुंद सी जमने लगी है 
यादों की चादर भी गीली सी हो गयी है 
इस ओस से इसने धक् दिया है पूरे प्रेम गगन को 

अब तो एक प्रतीक्षा में ही काट सकता हूँ 
मैं इस जीवन को की म्रत्यु से पूर्व ही सही
बस एक चमक जाये सूर्य तेरे प्रेम का
और छट जाये विरह की ये बदली में आंगन से ...











मैं.....!!

आपने ही घर में आज किरायदार सा हूँ मैं 
गुजारी है जहा जिन्दगी पूरी आज वही मेहमान सा हूँ मैं 

जिनके लिये सुख के लिये त्यागा सब कुछ अपना आज उनसे ही अनजान सा हूँ मैं 
मैं क्यों आज उस बुढ़ापे सा जिसकी आहट से थम जाती है साँसे अच्छे अच्छो की 

जीवन के पड़ाव पे ठहरी गति शुन्य सवारी सा एक मोक्ष के इंतजार में तडपती आत्मा सा हु मैं 
क्या कसूर मेरा ही है और परिणाम है ये मेरे ही कर्मो का जो खड़ा है आज मेरे ही सामने 

या भोग रहा हूँ फल मैं पिछले जनम किसी जनम का जिसने आज छीन लिया है सब मेरा 
और निराधार इस्तंब सा आज खड़ा वीरान सा मैं .....

Tuesday, February 25, 2014

अब रहने दो ...!!

मत  करो बदनाम इसको ये पावन है इसे  ही पावन रहने दो 
मत उड़ाओ कीचड़ इस पे इसे निर्मल ही बहने दो 
 ये प्रेम है नहीं कोई तुम्हारे महलों के बाग का फूल 
ये गरीब के घर में भी उगता है इसको वहा भी  उगने दो 
मत करो कैद इसको  चार दिवारी में 
ये खुले आसमान में उड़ता है इसको वही उड़ने दो 
ये बसता नहीं सिर्फ प्रेमी प्रेमिकाओ के हदय में 
ये देश में भी कला और राजनीती में भी रहता है 
अगर ये ही हो  गया ख़तम तो सोचो तुम्हारा क्या होगा
कौन तुम को पूजे का समाज के ठेकेदारो   
इसे चुप चाप अपनी ही दुनिया में युही मगन रहने दो 
मत करो सौदा इसका इसको युही बे मोल रहने दो 
ये होगा तो तुमको भी मिलेगे तुम्हारी वाहवाही करने वाले 
तो खुद के लिये ही सही इसको जैसा है वैसा ही रहने दो 
इसी ने ही बचा रखी है समाज के दिलो इंसानियत तोड़ी सी लौ 
तो घिरणा के नीर से भुझा इसको  के तमाशा देखना अब रहने दो 

Friday, February 21, 2014

मैं आम आदमी

मैं क्या कर सकता हु , मैं तो आम आदमी हु ! खुद टैक्स देकर रोड बनवाता हु फिर उन्ही रोअदो के गद्दों में अपने को गिरता देखता हु . मैं कर भी क्या सकता हु मैं आम आदमी हु . मैं वोट दे सकता हु पर अपने ही नेता से कोई उम्मीद नहीं कर सकता ! बस चुप चाप पाच साल इंतजार करता हू . और मैं कर भी क्या सकता हु मैं आम आदमी हु कर्जा लेकर बेटी की शादी करता हु . फिर अपने ही सामने ही सामने उसे दहेज़ के लिए जलता देख ता हु . पर मैं कर भी क्या सकता हु मैं आम आदमी हु !! पड़ोस के मकानों में जहा खेलता था बचपन में दंगो में उन्हें ही जलता देख ता हु . पर मैं कर भी क्या सकता हु मैं आम आदमी हु !!! अपने से कम काबिल को पैसे देकर नौकरी पाता देखता हु पर मैं कर भी क्या सकता हु मैं तो आम आदमी हु !!! मैं लोन लाकर कार तो ले सकता हु पर उसमे पेट्रोल नहीं पडवा सकता हु ! कहने को तो हमें की है तरक्की बहुत पर मैं आज भी खुद को वाही पचास साल पहले खड़ा देखता हु . पर कर भी क्या सकता हु . मै…………………

पिता

माँ का प्यार तो दिखता है पर पिता का समझ नहीं आता है
माँ ममता की मूरत है तो पिता त्याग का दरिया
माँ कह देती अपना दुःख तो मौन और गुमसुम है
ऊपर से कठोर मगर पर हदय सौम्य और निश्चल है
माँ ने गर चलना सिखाया तो गिर कर समलना वही सीखता है
हमारे सुख को देख हमेशा वो मंद मंद मुस्काता है
और हमको तो इसमें हमेशा उसका निज श्वार्थ ही नज़र आता है
दुःख में जो साथ हमारे हर वक्त खड़ा नज़र आता है
वही पिता सुख में हमेशा हमसे कही दूर हो जाता है
मैंने भी ये तब माना पास न आपने जब उनको जाना
अब बस हर याद पे उनकी बस इतना ही कहता हु
माँ का प्यार तो दिखता पर पिता का क्यों समझ नहीं पाया मैं
आज बहुत याद आते हूँ आप ....................अभिषेक
 —

वो परी

कुछ सालो पहले लिखी अपनी एक कविता आज अचानक याद याद याद आगई ....
रात सपने में एक पारी आई , 
इतलाती बलखाती थोरा सरमाई 
भोली सी चंचल सी वो वो देख मुझे धीरे से मुस्काई 
कल रात सपने में एक पारी आई 
जैसे ईश्वर का वरदान थी वो धरती की मेहमान थी वो 
जैसे लेकर प्यार का संदेशा वो आई 
इससे पहले कुछ कहती वो 
नींद मेरी टूट गयी 
वो मुझसे छुट गयी
मैं बस इतना ही कहता रह गया
की क्यों ये सुबह आई
क्यों ये सुबह आई
कल रात सपने में एक पारी आई .......अभिषेक

सुहाना अहसास

आज सुबह जब मैं जब मैं कई वर्षो याद भी नहीं कितने नियमित दिनों से काफी जल्दी सो कर जागा तो जैसे ही मेरी नज़र खिड़की से आती हुई सूरज की किरणों पर पड़ी तो मैं स्वयं ही उसकी ओर खिचता चला गया और उस द्रश्य को देख के जो अनुभुति मेरे हदय को हुई उसको यहाँ व्यक्त करने का प्रयत्न कर रहा हु ...
आज हमने फिर से सुबह को आते देखा
बड़े दिनों के बाद आज फिर से सुबह को देखा
सूरज को अंगड़ाते हुए आते मुस्कुराते देखा
आज हमने फिर से सुबह को आते देखा
अहसास सुहाना था उस पल उमंग पूर्ण निर्मल
और आपने को तो बस हमने सुबह के मेहमान सा देखा
देख बड़े समय बाद हमें उस सुबह को स्वागत में मुस्कुराते देखा
छड़ भी न लगे याद आने में बचपन के दिन अपने
और हमने खुद को माँ की उंगली थामे स्कूल को जाते देखा
आज हमने फिर से सुबह को आते देखा
आज जैसे कह रही हो सुबह हमसे बहुत बड़े हो गए हो तुम
मैंने तो तुमको जवान होते भी न देखा
तब हमने उसको भारी मन से फिर मुस्कुराते देखा
हम बस आश्चर्य से देखते रहे उस सूरज को
जिसको इतने वर्षो से हमने सिर्फ जाते हुए ही देखा
आज हमने फिर से सुबह को आते देखा
और थोड़ी कोशिश की तो चिड़िया के घोसले से भी
नयी सुबह का स्वागत हमने देखा
पंख फैला के चिड़िया के बच्चो को उड़ने की कोशिश करते देखा
दिन भर की दौड़ भाग में व्यस्त लोगो को उसके लिये उर्जा जुताते देख
फिर अहसास हुआ हमको की जीवन की अनजान दौड़ जितने के लिये हमने क्या क्या खोया और फिर अपने को गलतियो पे आज पछताते देखा
आज फिर से से हमने सुबह को आते देखा
पर अगले पल शायद घडी के कांटो ने झंजोड़ा हमको
और आजाओ वापस वर्तमान में और दौड़ो वाही न ख़तम होने वाली जीवन की दौड़ यही कहते हुए उसने हमको वापस आने को बोला
तब हम आपने को फिर से सुबह से जुदा होते देखा
पर वादा जरुर किया हमने आने का जल्दी वापस
पर सुबह को जुदा हो हमसे फिर उदास देखा 

आज हमने फिर से सुबह को आते देखा .

पहला प्यार

जीवन का पहला प्यार जो सभी को जीवन में एक न एक बार जरुर होता है कुछेक को छोड़ बकिओ का ये पहला प्यार बस याद बन कर ही रह जाता है और जब एक ये याद कई सालो के बाद एक हकीकत की तरह अचानक हमारे सामने से गुजरता है तो जो अहसास होता उस अहसास को इन चंद पगंतियो के माध्यम से व्यक्त कर पहले प्यार को समर्पित कर रहा हूँ ..


कैसे भूले उन पलों को जब एक दुसरे में जीते थे तुम और हम
प्रेम के अहसासों से हर पल संभलते थे तुम और हम
छोटी छोटी खुशियों को जीने की वजह बनाते थे तुम और हम
सुद्बुद छोड़ दुनिया की एक दुसरे में बस खो जाते थे तुम और हम
रातों में जब एक दुसरे को सुला के फिर यादो में रात भर जागते थे तुम और हम
फिर अचानक एक दिन मर्यादाओ के बंधन में जब बंध गए तुम
और निराश हदय से अकेले रह गए हम सिर्फ हम
फिर कभी न जीवन में साथ चले तुम और हम
बस यादों के भोझ लिये चलते चले गए हम
फिर कभी भी न कह पाए हम की एक ही हदय में रहते है थे तुम और हम
आज भी गूंजती है तेरी वो बोली जब रोते रोते कहा था तुमने अब बस जुदा होते है तुम और हम
बड़ी कोशिशो के बाद थोरा थोरा अकेले चलना जब सीखे तो फिर अचानक से एक दिन क्यों सामने अगये तुम
और फिर उन अहसासों में नाजाने क्यों जीने लगे हम
फिर एक दिन से जब अचानक दुल्हन के लिबास में जब सामने थे तुम
और देख तुझे दुसरे का होते सच में एक पल के लिये निष्प्राण से हो गए थे हम
आँखों से बहते नीरो को चाह के भी न रोक पाए हम
पर कुछ ही पल में समले हम समझ के इस जीवन की सच्चाई को हम
बस चल पड़े फिर से जीवन के एक अंजान सफ़र पे हम..सिर्फ हम
पर पता है हमको की कभी भूल न पाएगे उन पलों को जब एक दुसरे में जीते थे तुम और हम …तुम और हम

बदलाव

अक्सर जब लोगो सामाजिक नीतिओ और आज कल का सबसे प्रचलित राजनीती चाहे वो आम हो या खास ये प्रचलित शब्द क्यों प्रयोग किया मैंने अब समझ में आगया पर अपनी लम्बी लम्बी राय जताते देखता हूँ तो लगता ही नहीं की ये वही लोग जो कुछ समय पहले तक बीबी की साडी माँ की दवा बच्चो की फ़ीस और बेटी की शादी में इतना व्यस्त थे की अपनी राय जताने का भी समय नहीं निकल पाते थे आज क्या उन पिछली व्यस्ताओ से फुर्सत मिल गयी या ये समझ चुके है अब कुछ तो बदलना चाहिए या फिर ये फुर्सत पसंदों की वही भीड़ है जो हमेशा से अपने बहुमूल्य समय ऐसे ही नष्ट करते है देश के ऊपर चिंतन करके फिर भी शायद अब समय आ गया है की कुछ वक्त तो इस चर्चा पर दिया जाये लेकिन क्या सिर्फ चर्चा करने से सोशल मीडिया से शेयर करने कुछ बदलने वाला हैं या वाकई में वक्त आ गया है की कुछ तो नया होगा ……………………… कुछ तो बदले गा………
अभिषेक

Wednesday, February 19, 2014

लाल पत्थर के आंसू

लाल पत्थर के आंसू

ये अनुभव एक ऐसे जगह का है जिसकी एक दूसरी ही तस्वीर हमने देखी  या सुनी है  मगर जो सच मैंने देखा वो वाकई में बड़ा कष्ट कारी था कुछ वर्ष पहले मुझे अपने काम के सिलसिले में उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में जाना पड़ा शायद विन्ध्याचल का नाम आप सभी ने सुना होगा  एक पावन तीर्थ स्थल और उत्तर प्रदेश के लोगो ने खास कर मेरे शहर लखनऊ के लोगो ने तो एक नेता की जिद से ही सही एक जिले के उस रूप को बहुत ही करीब से देखा है जिसके अलावा यहाँ शायद और कुछ नहीं लाल पत्थर यहाँ के पठारों में सिर्फ हर ओर कुछ नज़र आता है तो वो है लाल पत्थर और लाल मिट्टी मुख्य नगर से अगर आप थोडा  आगे बडेगे तो आप को भी ये लाल पथारो के विशाल पहाड़ जरुर दिखाई देगे हर और हर तरफ बस बड़े बड़े लाल पहाड़ इन्हें देख के बस बस ऐसा ही लगता है कि  
 हर तरफ फिज़ाओ में एक अलग ही साया है 
जैसे बिना होली के किसी ने लाल गुलाल उड़ाया है
  थोड़ा और आगे बडे तो गंगा तट का एक अजीब सा नज़ारा था यहाँ की रेत ने तो मुझे न गए हुए ही समुद्र तट के दर्शन करवा दिए फिर अपने काम के सिलसिले में हम एक छोटे से गाँव जो मध्य प्रदेश से सटा हुआ था पहुचे नाम तो शायद आज याद नहीं पर जो तस्वीर मैंने देखी वो कभी नहीं भूल सकता हम शिक्षा की स्थिति को लेकर और वह के बच्चो की शिक्षा की स्थिति को जानने वह गए थे जैसे ही एक घर में मैं पंहुचा उस परिवार के सभी लोग यहाँ इक्कठा हो गए और मुझे ऐसे देखने लगे जैसे शायद कभी आम इन्सान न देखा हो पहले तो मुझे भी काफी अजीब लगा पर मेरे साथ गए वह के एक स्थानीय ने जब उन्हें बताया की मैं लखनऊ से हु तो बड़ी उम्मीद भारी निघाहे थी मेरी तरफ शायद वो मैं वर्णन न कर पाउगा  मैं,  पहले तो मेरे आसान की व्यवस्था हुई एक टूटी सी चारपाई शायद आज पता चला इसे  चारपाई क्यों कहते है उसमे सिर्फ चार पावो के अलावा कुछ भी बचा न था बड़ी ही संकुचित से नज़रो से मुझे उस पर आसीत होने को कहा गया पर मैं ये सोच की शायद इसमें जो कुछ बचा है वो मेरे असित होने ख़तम न हो जाये मैं वही पास की दरवाजे की मेड पर असित हो गया पहले तो काफी रोका मुझे पर मेरे न मानने पर अतंत मेरी ही विजय हुई उसके तुरंत बाद क्यों काफी गला सुख गया था मेरा और मेरी बोतल का मिनरल पानी भी  ख़तम हो गया था तो मैंने पानी का आग्रह कर ही डाला मैंने जैसे की पानी माँगा तो उस तरफ से एक ही उत्तर आया हम छुद्र जाती के है क्या आप अब भी पानी पियेगे मैं स्तभ सा हो गया एक पल को  उन की जाती पे नहीं बल्कि ये सोच के  की  

वह रे धरती के विधाता इन्सान तो इन्सान पानी को भी जात पात में रंग डाला 

मेरी चुप्पी को को शायद को मेरा इंकार न समझ बेठे इससे पहले मैंने फिर से पानी लाने का आग्रह करते हुए सिर्फ इतना ही बोला मुझे फर्क  नहीं पड़ता फिर एक जीत सी मुस्कान के साथ मेरे लिये पानी और साथ में गुड भी आया उसको लेकर शायद मुझे सिर्फ  सुदामा के हाथ से भोजन करते भगवन कृषण याद आये फिर आगे मैंने एक बच्चे से बात शुरू की कहा पड़ते हो क्या पड़ना पसंद है और मुझे देख कई सारे बच्चो से मेरे पास भीड़ भी  लगा ली  तभी एक बच्चा बोला मुझे पड़ना है मास्टर साहब स्कूल से भगा देते है और किताबे भी नहीं देते आप मुझे पढ़ाने आये हो मुझे  सच में पड़ना पसंद है ये सुन कर मैं स्तभ सा होगया उस मासूम की बात सुन के शायद बड़ी हिम्मत से अपने आंशुओ को रोक के मैंने उस बच्चे से कहा हां बीटा क्या पढोगे फिर क्या था उन सभी ने मुझे ऐसे घेरा जैसे गोपिओ को कान्हा मिल गए मैं मगन हो गया आपने छोटे छोटे छात्रों के स्थ और समय का पता न चला एक से दो घंटे बाद शायद कुछ अहसास हुआ तो मैंने उनके माता पिता से बात की क्या दिक्कत है क्यों नहीं पढाई तो सर्व ज्ञात शुरुवात  सरकार की नीतिओ की आलोचनाओ से हुई मगर मैं हु उन पहाड़ो की तरह जो मुझे रस्ते में मिले थे मौन सब सुनता रहा मेरी तभी एक अजीब से भोजन पड़ी जो एक बच्चा खा रहा था मैंने मैं पूछ बैठ गया क्या है ये उन्होंने आपनी भाषा में कुछ बतया फिर मैं उस स्थानीय साथी ने मुझे बताया जो शायद असहनीय न वो एक जंगली घास थी लाल मिटटी में कोई फसल न होती इस कारन से ये बरसतो में पहाड़ो पे उगने वाली घास को ही पिस कर खाते है मेरा अगला ही सवाल था और गर्मी में अब शायद उसके पास भी उत्तर न था और मै बस सोचता  ही रह गया की हम जब अपने बड़े बड़े शहरों में जरा सी गर्मी में पता  नहीं क्या क्या कर लेते है तब इन के पास शायद पेट भरने को भी  कुछ न होता होगा औए अचानक  ही अपने गालो पर मुझे गिला पन महसूस हुआ और थोड़ी ही देर के बाद मौसम ने  मेरे आसूओ को छुपाने के लिये खुद बदलो के आसूओ को बहा दिया और तेज बारिश होने लगी जैसे शायद मेरे साथ वो लाल पत्थर भी रो पड़े हो और शायद ये उन लाल पत्थर के ही आँसू थे जो बह बह कर उन लोगो के एक वक़्त के भोजन की व्यवस्था कर रहे थे ,,,,,,,,,,,,,,,,