तेरी ही यादों को लगातार लिख रहा हूँ मैं
जो भी हूँ जैसा भी हूँ सरे बाज़ार बिक रहा हूँ मैं
कहते थे जो कभी मुझ को एक ही अपना
आज उनकी ही आँखों में नहीं दिख रहा हूँ मैं
आभाव हो गया हो जैसे प्रेम का हर ओर
बस घृणा की अंगीठी में सिक रहा हूँ मैं
यूं तो कुछ जान बाकी है अभी मुझमे मगर
फिर भी हर रोज एक नयी अर्थी पर चढ़ रहा हूँ मैं
कोई तो दिखा दे मुझे सूरज उम्मीदों का
उसी की खोज में दिन रात जल रहा हूँ मैं
जो भी हूँ जैसा भी हूँ सरे बाज़ार बिक रहा हूँ मैं
कहते थे जो कभी मुझ को एक ही अपना
आज उनकी ही आँखों में नहीं दिख रहा हूँ मैं
आभाव हो गया हो जैसे प्रेम का हर ओर
बस घृणा की अंगीठी में सिक रहा हूँ मैं
यूं तो कुछ जान बाकी है अभी मुझमे मगर
फिर भी हर रोज एक नयी अर्थी पर चढ़ रहा हूँ मैं
कोई तो दिखा दे मुझे सूरज उम्मीदों का
उसी की खोज में दिन रात जल रहा हूँ मैं


