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Tuesday, April 8, 2014

जल रहा हु

 तेरी ही यादों को लगातार लिख रहा हूँ मैं 
जो भी हूँ जैसा भी हूँ सरे बाज़ार बिक रहा हूँ मैं 

कहते थे जो कभी मुझ को एक ही अपना 
आज उनकी ही आँखों में नहीं दिख रहा हूँ मैं 

आभाव हो गया हो जैसे प्रेम का हर ओर
बस घृणा की अंगीठी में सिक रहा हूँ मैं

यूं तो कुछ जान बाकी है अभी मुझमे मगर
फिर भी हर रोज एक नयी अर्थी पर चढ़ रहा हूँ मैं

कोई तो दिखा दे मुझे सूरज उम्मीदों का
उसी की खोज में दिन रात जल रहा हूँ मैं 

मेरे नेता तू ही महान है

मेरे देश की निराली ही शान है
तभी तो कहते है हम मेरा भारत महान है

सौपी राखी चोरों के हाथ में कमान है
तभी तो इसकी हर एक शाखा बीमार है

कर रहे है बन के हकीम इलाज इसका वो
जिनकी तो पूरी की पूरी नसल बीमार है

भ्रष्टाचार के रोग से ग्रसित है ये खुद
और कहने को इनके पास हर रोग का निदान है

आजाते है हर पांच साल पर चेहरा वही लिये
चोला बदल रहे इतना की दरजी परेशान है

वादों की हर गोलियो से लेस है ये सभी
हर बार सजती नयी सी इनकी दुकान है

चट कर रहे है देश को ये कुछ इस तरह
की इनके सामने तो लगता दीमक भी नादान है

सत्ता की हनक में छुपा लिये है चेहरे असली
सच है रे भारत के नेता तेरी अलग ही पहचान है

अब लगता है बदल दू इस कथन को मैं
और कहू की सच में बस मेरे नेता तू ही महान है
 — 

तेरा नाम

दीवारों पर लिखकर आज भी तेरा नाम मिटाया करता हूँ,
तन्हाई को अपनी हर बात बताया करता हूँ.

तेरे उन्ही प्रेम गीत को बस मैं गुनगुनाया करता हूँ ,
जब भी होता हूँ तन्हा बस में गाया करता हूँ.

अब बस साथ यही है मेरे ,वीरानी सी रातों में 
तुम्हारी ही यादो से दिल को बहलाया करता हूँ.

वो वफ़ा की कसमे जो खायी थी हम दोनों ने ,
बस याद कर उन्हें ही मैं मुस्कुराया करता हूँ

दीवारों पर लिखकर आज भी तेरा नाम मिटाया करता हूँ,...

अभिषेक

वो अजनबी

बरसो बाद आज वो अजनबी अपना सा लगा ,
शुरू हुआ बातों का सिलसिला आज बड़ी देर तक चला ।
प्यार से जब उसने समझाया तो कठिन रास्ता भी आसान सा लगा ,
उसकी डाट का अंदाज़ भी आज मीठा सा लगा 
उसकी मस्ती दिल में उड़ने का अरमान जगा गयी ,
उसकी आखों की शरारत जाने क्या-क्या कह गयी 
उसका रूठना और फिर मान जाना प्यारा सा लगा ,
उसकी फ़ालतू बातों को सीरिअस लेना अच्छा लगा ।
उसकी ख़ामोशी भी ना जाने कितना कुछ कह गयी ,
और कभी बातें भी उसकी ख़ामोशी को बयान कर गयी
इतना सब जानते हुए भी वो अजनबी सा लगा ,
उसका हर एक पल एक नया राज़ खोल गया
फिर भी उस अजनबी का साथ आज अच्छा सा लगा है ।

जीवनसाथी

जीवन साथी, हमसफ़र या फिर कुछ और कहो, हमारे जीवन के साथी के बहुत सारे नाम होते है! ये एक ऐसा रिश्ता होता है जो सिर्फ हमारा साथ देने के लिए ही बनाया गया होता है! एक ऐसा रिश्ता जो हमारा आईना होता है, जो हर कदम पर, हर परिस्थिति में हमारा साथ देता है, हमें संभालता है या यूँ कहू की वो हमारी आत्मा से जुड़ा होता है!

ये ज़िन्दगी भी कितनी अजीब पहेली होती है , वैसे तो हमें हमारे सारे रिश्ते ( मम्मी, पापा, भाई, बहन......) पैदा होने के साथ ही मिल जाते है पर जिसके लिए या फिर जिसके साथ हमें अपनी पूरी ज़िन्दगी बितानी होती है उसके बारे में ही हमें कुछ पता नहीं होता है, बस सपने ही सजाते रहते है की वो ऐसा होगा/होगी, वैसा होगा/होगी, उसके साथ ऐसे जीएगे वैसे जीएगे ..... जिसके साथ हमारी सारी आशाए और खुशियाँ जुडी होती है उसे पाने और जानने के लिए हमे अपनी आधी ज़िन्दगी का लम्बा इंतज़ार करना पड़ता है !

हर इंसान यही ही चाहता है की उसका साथी उससे बहुत प्यार करे, उसकी हर ख्वाइश और परेशानियाँ उसके कहे बिना ही उसकी आँखों में पढ़ ले .......... अगर वो परेशान हो तो वो बड़े ही प्यार से अपने दोनों हाथो से उसका चेहरा थाम कर बोले ," परेशान मत हो मै हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगा/रहूँगी!".......... जब भी कभी आपकी तबियत ख़राब हो तो आपका सर अपने गोद में रखे और अपने एक हाथ से आपका हाथ पकडे और दुसरे हाथ आपके सर पर रखे और बोले" मै हमेशा तुम्हारा ख्याल रखूँगा/रखूंगी!".... अगर आपसे कभी कोई गलती हो जाए तो वो बड़े ही प्यार से मुस्कुराकर बोले " कोई बात नहीं गलतियाँ इन्सान से ही होती है!" एक ऐसा साथी जिसकी ख़ुशी ही आपकी ख़ुशी बन जाए! जो दूर होकर भी हमेशा आपके साथ रहता/रहती हो, जिसके बिना हर ख़ुशी बेमानी हो जाये!

कितने खुशनसीब होते है वो लोग जिन्हें उनका मनपसंद जीवन साथी मिल जाता है जबकि कुछ लोगो के सपने सिर्फ सपने ही बन कर रह जाते है! लेकिन मुझे सबसे ज्यादा तरस और दुःख उन बदनसीब लोगो पे आता है जिन्हें जीवन साथी तो उनकी पसंद का मिलता/मिलती है पर वो अपनी नासमझी और नादानी से उन्हें खो देते है और फिर जीवन भर पछताते रहते है! ऐसे लोग ये नहीं सोच पाते की वो ल़ोग कितने भाग्यशाली होते है, वरना कितने ही ऐसे लोग है जो किसी न किसी वजह से, चाहे वो समाज के कारण या परिवार के कारण या फिर एक तरफ़ा प्यार होने के कारण उसे 
खो देते है जिससे वो बेइएन्तेहा प्यार करते है!

कुछ ल़ोग का मानना है की शादी एक फंदा है जिसमे बंधकर उनकी ज़िन्दगी ख़राब हो जाती है! शायद उनकी ये सोच इसलिए ऐसी हो गयी है क्योकि हमारे समाज में कुछ घटिया लोगो ने इस "पवित्र रिश्ता" के ऐसे गंदे उदाहरण सामने रखे है जिससे कुछ ल़ोग या हम सभी ल़ोग अपने जीवन साथी को पाने और जानने से पहले इस रिश्ते में बंधने से डरते है!

लेकिन हमें खुद ही ये समझना चाहिए की अपने रिश्ते में खुशियाँ बनाये रखने के लिए उसे हमें किस तरह से उसे निभाना चाहिए! अगर हमें अपने साथी से कुछ आशये है तो उसकी भी तो कुछ आशये हमसे जुडी होती है, जिसे हमें भी पूरी करनी चाहिए! हमें हमेशा अपनी खुशियों को ही नहीं मनवानी चाहिए बल्कि उसकी खुशियों में ही अपनी खुशिया ढूंढनी चाहिए!

"प्यार और विश्वास" इस रिश्ते की सबसे गहरी नीव होती है! अगर ये दो चीज़ हम अपने रिश्ते में बनाये रखे तो कभी कोई परेशानी नहीं आएगी!

असमंजस

दर्पण पे जमी हो धूल तो श्रृंगार कैसे हो
जब तक है भूखा आदमी तो प्यार कैसे हो 


पढ़ लिख कर सब बन गए शहर में दफ्तर के बाबू 
खेतों में अनाज की अब पैदावार कैसे हो 


मंहगाई को जिद ही है अब छूने को आसमां
गरीबों के घर तीज और त्यौहार कैसे हो


मतलब नहीं है देश के आदमी को देश से
राम जाने इस देश का बेड़ा पार कैसे हो


ले चल अब मुझे दूर कहीं मुर्दों के शहर से
मुर्दों के शहर में कविता का कारोबार कैसे हो

कविता

कवितायें कभी लिखी नहीं जाती 
वह तो जन्म लेतीं हैं 
उस भूख से 
जो मन के किसी 
कोने में दबी हुई 
कोई अतृप्त 
इच्छा है 
या यह कोई 
ऐसी भूख है जो 
कहीं पनप रही है 
आहिस्ता आहिस्ता
और उनको शांत करने का
कोई माध्यम
कहीं कोई
नजर नहीं आता
वह फिर कलम से
बहती है आतुरता से
और कहती अपनी बात
उन अनकही
इच्छाओं से जो
अपनी बात कहने का
स्खलित होने का माध्यम
तलाश कर लेती हैं
अपने ही किसी मन के द्वार से
पर रह जाती हैं
फिर भी अतृप्त सी
और फिर उसको
कोई शैतान कोई खुराफात
कोई प्रेम आदि आदि
के लफ़्ज़ों में ढाल कर
अपनी बात कह देते हैं
और..........
वही लिखा हुआ
फिर कविता कहलाता है

बदलाव

न उसकी अदा और न उसका ये शहर बदला 
कुछ बदला है तो बस 'अभी' बस मेरा ही ठिकाना बदला 

मत हो तू उदास और तन्हा इस कदर ये शराबी मन 
जाम तो वाही बस बदला है तो महखाना बदला 

हम आज भी जैसे खड़े थे उसी आयाम पे
छोड़ हमें बाकि सारा जमाना बदला

लिखने का तेवर आज भी वही है मेरा
बस बदला है तो मेरे लफ्जो का ठिकाना बदला

दो घडी भी नहीं रुक पाया तू मेरे लिये ए वक़्त
आज मेरे हिस्से में तेरा पैमाना बदला

शाम की दहलीज़ में आज भी ठहर जाते है कदम मेरे
शायद अब तो उनकी मसरुफियातो का फ़साना बदला


अभिषेक 

काश मैं सौदागर होता

काश मैं सौदागर होता तो चाँद की चाँदनी
ले आता गठरी में बांध और देता सबको बाँट
लम्हा-लम्हा जिंदगी न गुजरती यूं प्यासी सी
काश कही सच होते सपनो का सागर होता
तो ले आता मैं भर नीर उसका
और उधेल देता जीवन में सबके
काश मैं सौदागर .......

प्रेम

आज फिर किसी से प्यार कर बैठे हम 
शायद फिर ये ऐतराम कर बैठे हम 
फिर से जीने लगे उन पलों को 
जिनसे बहुत दूर हो गए थे हम
छोटी छोटी खुशियों में फिर 
जीने की वजह ढूढने लगे हम 
फिर किसी से प्यार करने लगे हम

बटवारा

चलो आज जहां बांट लें
तुम मेरे, बाकी सब तुम्हारा
तुम्हारी हंसी मेरी और
जहांभर की खुशियां
तुम समेट लेना
तम्हारी इच्छाएं मेरी,
दुनिया भर की चाहतें
तुम पूरी कर लेना
तुम्हारें सपने मेरे
बाकी नींद तुम रख लेना

क्या मैं तेरा नाम लिखू

तुझे रात लिखू या शाम लिखू 
आखिर क्या मैं तेरा नाम लिखू 

अपने दिल के सारे अरमान लिखू
हर बार लिखू बार बार लिखू 

सोच के फिर पड़ गया मैं विस्मय में
की हृदय की इस पुस्तक में कैसे तेरा अध्याय लिखू

शब्दों के खालीपन में भी इस जीवन की
उलझन में भी अंतिम मैं एक मक़ाम लिखू

आखिर क्या मैं तेरा नाम लिखू
तुझे शाम लिखू या रात लिखू

बहुत कुछ लिखना है ..

बहुत कुछ लिखना है ..
शब्द गुम हैं मेरे..
सर्दी की धुप में ...
दोस्ती की चुप्पी में..
दिवाली जैसे उत्सव के मेले में...
अपने कमरे के अकेलेपन में .
घर की सफाई में...
बच्चो की पढाई में...
फिर भी मुझे बहुत कुछ लिखना है.............

रात के अँधेरे पर..
सुबह की किरणों पर..
सुरमई शाम पर...
अलसाई दोपहर पर..
फिर भी मुझे बहुत कुछ लिखना है......

उसकी प्यार भरी बातों पर..
उसके गुस्से भरी आँखों पर..
खुद की परेशान जिंदगी पर..
मेरी हंसती बंदगी पर..
फिर भी मुझे बहुत कुछ लिखना है...

वो मधुमास की यादें
वो फ़ोन पर की हुई खुसफुसाहट
वो लम्बे खतो की बयानी...
बिना बोले तेरे मेरे लबो की कहानी..
फिर भी मुझे बहुत कुछ लिखना है ....

कैसे लिखूं...
जब वक़्त होता है ..
तब तेरे प्यार की चादर..
ओढ़ कर सो जाती हूँ खयालो में..
जब ख्याल होते हैं...
तो फुर्सत ही नहीं होती सजन...
पर फिर भी मुझे बहुत कुछ लिखना है..

अहसास

रात दहलीज़ पे आकर फिर दगा दे गयी
लौट गयी फिर तन्हाई का दामन थमा हमें

अधूरे अहसास प्रेम के जगा वो हसीन शातिर 
दफ़न फिर कर गयी कब्र ए महोबत में हमें

कोई दिल तोड़ ता तो माफ़ भी कर देते हम उसको
वो कातिल तो निकाल के साथ दिल ही ले गयी

आंसू भी अब कहा से निकले इस वीरान जमीं से
अहसास वरखा का अपने साथ ले बंज़र कर गयी हमें


तौबा अब करे भी तो हम अब किस जुबान से
अलफ़ाज़ साथ ले बेजुबान फिर कर गयी हमें