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Tuesday, April 8, 2014

कविता

कवितायें कभी लिखी नहीं जाती 
वह तो जन्म लेतीं हैं 
उस भूख से 
जो मन के किसी 
कोने में दबी हुई 
कोई अतृप्त 
इच्छा है 
या यह कोई 
ऐसी भूख है जो 
कहीं पनप रही है 
आहिस्ता आहिस्ता
और उनको शांत करने का
कोई माध्यम
कहीं कोई
नजर नहीं आता
वह फिर कलम से
बहती है आतुरता से
और कहती अपनी बात
उन अनकही
इच्छाओं से जो
अपनी बात कहने का
स्खलित होने का माध्यम
तलाश कर लेती हैं
अपने ही किसी मन के द्वार से
पर रह जाती हैं
फिर भी अतृप्त सी
और फिर उसको
कोई शैतान कोई खुराफात
कोई प्रेम आदि आदि
के लफ़्ज़ों में ढाल कर
अपनी बात कह देते हैं
और..........
वही लिखा हुआ
फिर कविता कहलाता है

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