कवितायें कभी लिखी नहीं जाती
वह तो जन्म लेतीं हैं
उस भूख से
जो मन के किसी
कोने में दबी हुई
कोई अतृप्त
इच्छा है
या यह कोई
ऐसी भूख है जो
कहीं पनप रही है
आहिस्ता आहिस्ता
और उनको शांत करने का
कोई माध्यम
कहीं कोई
नजर नहीं आता
वह फिर कलम से
बहती है आतुरता से
और कहती अपनी बात
उन अनकही
इच्छाओं से जो
अपनी बात कहने का
स्खलित होने का माध्यम
तलाश कर लेती हैं
अपने ही किसी मन के द्वार से
पर रह जाती हैं
फिर भी अतृप्त सी
और फिर उसको
कोई शैतान कोई खुराफात
कोई प्रेम आदि आदि
के लफ़्ज़ों में ढाल कर
अपनी बात कह देते हैं
और..........
वही लिखा हुआ
फिर कविता कहलाता है
वह तो जन्म लेतीं हैं
उस भूख से
जो मन के किसी
कोने में दबी हुई
कोई अतृप्त
इच्छा है
या यह कोई
ऐसी भूख है जो
कहीं पनप रही है
आहिस्ता आहिस्ता
और उनको शांत करने का
कोई माध्यम
कहीं कोई
नजर नहीं आता
वह फिर कलम से
बहती है आतुरता से
और कहती अपनी बात
उन अनकही
इच्छाओं से जो
अपनी बात कहने का
स्खलित होने का माध्यम
तलाश कर लेती हैं
अपने ही किसी मन के द्वार से
पर रह जाती हैं
फिर भी अतृप्त सी
और फिर उसको
कोई शैतान कोई खुराफात
कोई प्रेम आदि आदि
के लफ़्ज़ों में ढाल कर
अपनी बात कह देते हैं
और..........
वही लिखा हुआ
फिर कविता कहलाता है

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