रात दहलीज़ पे आकर फिर दगा दे गयी
लौट गयी फिर तन्हाई का दामन थमा हमें
अधूरे अहसास प्रेम के जगा वो हसीन शातिर
दफ़न फिर कर गयी कब्र ए महोबत में हमें
कोई दिल तोड़ ता तो माफ़ भी कर देते हम उसको
वो कातिल तो निकाल के साथ दिल ही ले गयी
आंसू भी अब कहा से निकले इस वीरान जमीं से
अहसास वरखा का अपने साथ ले बंज़र कर गयी हमें
तौबा अब करे भी तो हम अब किस जुबान से
अलफ़ाज़ साथ ले बेजुबान फिर कर गयी हमें
लौट गयी फिर तन्हाई का दामन थमा हमें
अधूरे अहसास प्रेम के जगा वो हसीन शातिर
दफ़न फिर कर गयी कब्र ए महोबत में हमें
कोई दिल तोड़ ता तो माफ़ भी कर देते हम उसको
वो कातिल तो निकाल के साथ दिल ही ले गयी
आंसू भी अब कहा से निकले इस वीरान जमीं से
अहसास वरखा का अपने साथ ले बंज़र कर गयी हमें
तौबा अब करे भी तो हम अब किस जुबान से
अलफ़ाज़ साथ ले बेजुबान फिर कर गयी हमें

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