मेरी लेखनी और मैं ... मेरे अहसास जो कल तक हदय में बंद थे मेरी लेखनी ने उन्हें कागज पे उड़ेल दिया
Tuesday, April 8, 2014
काश मैं सौदागर होता
काश मैं सौदागर होता तो चाँद की चाँदनी ले आता गठरी में बांध और देता सबको बाँट लम्हा-लम्हा जिंदगी न गुजरती यूं प्यासी सी काश कही सच होते सपनो का सागर होता तो ले आता मैं भर नीर उसका और उधेल देता जीवन में सबके काश मैं सौदागर .......
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