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Friday, March 7, 2014

विरह ...!!

मैं स्मृतियों के कोहरे को हटा कर देखता हूँ 
कही सूरज ही दिख जाये प्रेम का तेरा 
मगर ये विरह के बादल बरसने के बाद भी 
तेरे हदय गगन का दामन थम कर बैठे है जैसे

कही एक ही दिख जाये मुझे किरण प्रेम सूर्य की 
जिस के ही सहारे से कुछ अगन ही लग जाये इस तन मैं 
जो तन शुन्य हो गया विरह की इस गलन से 
सिहरन बड़ने सी लगी सी इस गर्मी के मौसम में 

मैं मृत्य समतुल्य सा एक निष्तेज पड़ा हूँ 
कही खो गयी है जो चेतना इस जीवन की 
उसे अब कैसे लाऊ वापस मैं इस आंगन में 
वही कर दे कुछ उजाला एक अँधेरे जीवन में 

ये स्मृतियों के कोहरे भी तो बढाने लगे है 
हर ओर बस एक धुंद सी जमने लगी है 
यादों की चादर भी गीली सी हो गयी है 
इस ओस से इसने धक् दिया है पूरे प्रेम गगन को 

अब तो एक प्रतीक्षा में ही काट सकता हूँ 
मैं इस जीवन को की म्रत्यु से पूर्व ही सही
बस एक चमक जाये सूर्य तेरे प्रेम का
और छट जाये विरह की ये बदली में आंगन से ...











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