दर्पण पे जमी हो धूल तो श्रृंगार कैसे हो
जब तक है भूखा आदमी तो प्यार कैसे हो
पढ़ लिख कर सब बन गए शहर में दफ्तर के बाबू
खेतों में अनाज की अब पैदावार कैसे हो
मंहगाई को जिद ही है अब छूने को आसमां
गरीबों के घर तीज और त्यौहार कैसे हो
मतलब नहीं है देश के आदमी को देश से
राम जाने इस देश का बेड़ा पार कैसे हो
ले चल अब मुझे दूर कहीं मुर्दों के शहर से
मुर्दों के शहर में कविता का कारोबार कैसे हो
जब तक है भूखा आदमी तो प्यार कैसे हो
पढ़ लिख कर सब बन गए शहर में दफ्तर के बाबू
खेतों में अनाज की अब पैदावार कैसे हो
मंहगाई को जिद ही है अब छूने को आसमां
गरीबों के घर तीज और त्यौहार कैसे हो
मतलब नहीं है देश के आदमी को देश से
राम जाने इस देश का बेड़ा पार कैसे हो
ले चल अब मुझे दूर कहीं मुर्दों के शहर से
मुर्दों के शहर में कविता का कारोबार कैसे हो

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