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Tuesday, April 8, 2014

असमंजस

दर्पण पे जमी हो धूल तो श्रृंगार कैसे हो
जब तक है भूखा आदमी तो प्यार कैसे हो 


पढ़ लिख कर सब बन गए शहर में दफ्तर के बाबू 
खेतों में अनाज की अब पैदावार कैसे हो 


मंहगाई को जिद ही है अब छूने को आसमां
गरीबों के घर तीज और त्यौहार कैसे हो


मतलब नहीं है देश के आदमी को देश से
राम जाने इस देश का बेड़ा पार कैसे हो


ले चल अब मुझे दूर कहीं मुर्दों के शहर से
मुर्दों के शहर में कविता का कारोबार कैसे हो

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