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Tuesday, April 8, 2014

बदलाव

न उसकी अदा और न उसका ये शहर बदला 
कुछ बदला है तो बस 'अभी' बस मेरा ही ठिकाना बदला 

मत हो तू उदास और तन्हा इस कदर ये शराबी मन 
जाम तो वाही बस बदला है तो महखाना बदला 

हम आज भी जैसे खड़े थे उसी आयाम पे
छोड़ हमें बाकि सारा जमाना बदला

लिखने का तेवर आज भी वही है मेरा
बस बदला है तो मेरे लफ्जो का ठिकाना बदला

दो घडी भी नहीं रुक पाया तू मेरे लिये ए वक़्त
आज मेरे हिस्से में तेरा पैमाना बदला

शाम की दहलीज़ में आज भी ठहर जाते है कदम मेरे
शायद अब तो उनकी मसरुफियातो का फ़साना बदला


अभिषेक 

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