मैं कोई बादशाह नहीं न कोई अति विशिट मैं तो हूँ वही बस साधारण सा सदा गोल मटोल छोटा जिसकी जात का भी आज तक कोई पता नहीं बस एक कहावत है मेरे बारे जो शायद आपने भी सुनी होगी सच मानिये जब से मैंने सुनी पहले तो बड़ा गर्व हुआ पर जैसे जैसे ये प्रचलित हो मुझे पता चला इस कहावत से मैं फेमस नहीं बल्कि बदनाम हो गया '' अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता ‘ अब तो समझ जाओ मैं कौन हूँ अरे मैं वही चना हूँ जो बस इस निराशावादी कहावत में फास के रह गया निराशा वादी इस लिये क्यों जब भी किसी के क्रांति कारी मन ने हिचकोले खाने की सोची उसको यही कह से दबा दिया गया
और जिन होने अपने अन्दर के चने को को दबा दिया उन्होंने अकेले ही भाड़ फोड़ के दिखा दी वो भी बड़ी बड़ी। .
इसके अलावा भी मुझे बहुत से ताने मिलते है जैसे मैं भी कोई खाने की चीज़ हु मुझे तो घोड़े खाते है
अरे वो घोडा है जो मुझे खा कर आज आज जानवर है अगर नहीं खाता तो शायद मानव बन गया होता बच गया बिचारा मुझे खा कर और मुझे गर्व महसूस करा गया की मैंने भी किसी की जिन्दगी बचा ली
कितनी बार कर भ्रष्टाचारियो की की मैं जिंदगी बचा ली जब भी कोई क्रांति कारी मन उनकी खिलाफत करने को खड़ा हुआ बाद यही कह के दबा दिया गया अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता
अरे मैं बहुत सम्मनिये हु उनकी बिरादरी में बस मेरी पूजा नहीं करते आगे वो भी होगी वक़्त तो आता। ही दिख रहा है
मेरे अच्छे दिन और एक सच्चे मनुष्य के और बद्दतर दिन मगर मैं कहा से जिम्मेदार हु उनकी किस हालत का अरे बस कहावत है मुझ पे मैंने कोई थोड़ी कहा है उनसे की सुनो इसको।
अगर मेरी मनो तो ‘’ अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता ‘’ एक निराशावादी-गैरजिम्मेदार कहावत है जिसे पूर्वजों ने शायद परीक्षण-उपकरण की तरह उन लोगों की पहचान करने के लिए बनाया जो या तो जिम्मेदारी से दूर भागने का सम्मानजनक रास्ता ढूँढते हैं या फिर जो हुआ उस पर एक मखमली चादर डाल कर पूर्णाहुति का प्रयास करने को जिम्मेदारी-निर्वहन मानते हैं , पर भाई ज़िंदा इंसानों की भीड़ है ये कोई ‘’ गोभी का खेत ’’ नहीं की जो बोलो सो सत्य |
भाड़ तो अकेला चना ही फोड़ता है और जो चने भाड़ नहीं फोड़ पाते उनका हश्र उदरस्थ होना ही होता …।
और जिन होने अपने अन्दर के चने को को दबा दिया उन्होंने अकेले ही भाड़ फोड़ के दिखा दी वो भी बड़ी बड़ी। .
इसके अलावा भी मुझे बहुत से ताने मिलते है जैसे मैं भी कोई खाने की चीज़ हु मुझे तो घोड़े खाते है
अरे वो घोडा है जो मुझे खा कर आज आज जानवर है अगर नहीं खाता तो शायद मानव बन गया होता बच गया बिचारा मुझे खा कर और मुझे गर्व महसूस करा गया की मैंने भी किसी की जिन्दगी बचा ली
कितनी बार कर भ्रष्टाचारियो की की मैं जिंदगी बचा ली जब भी कोई क्रांति कारी मन उनकी खिलाफत करने को खड़ा हुआ बाद यही कह के दबा दिया गया अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता
अरे मैं बहुत सम्मनिये हु उनकी बिरादरी में बस मेरी पूजा नहीं करते आगे वो भी होगी वक़्त तो आता। ही दिख रहा है
मेरे अच्छे दिन और एक सच्चे मनुष्य के और बद्दतर दिन मगर मैं कहा से जिम्मेदार हु उनकी किस हालत का अरे बस कहावत है मुझ पे मैंने कोई थोड़ी कहा है उनसे की सुनो इसको।
अगर मेरी मनो तो ‘’ अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता ‘’ एक निराशावादी-गैरजिम्मेदार कहावत है जिसे पूर्वजों ने शायद परीक्षण-उपकरण की तरह उन लोगों की पहचान करने के लिए बनाया जो या तो जिम्मेदारी से दूर भागने का सम्मानजनक रास्ता ढूँढते हैं या फिर जो हुआ उस पर एक मखमली चादर डाल कर पूर्णाहुति का प्रयास करने को जिम्मेदारी-निर्वहन मानते हैं , पर भाई ज़िंदा इंसानों की भीड़ है ये कोई ‘’ गोभी का खेत ’’ नहीं की जो बोलो सो सत्य |
भाड़ तो अकेला चना ही फोड़ता है और जो चने भाड़ नहीं फोड़ पाते उनका हश्र उदरस्थ होना ही होता …।

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