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Friday, February 21, 2014

पिता

माँ का प्यार तो दिखता है पर पिता का समझ नहीं आता है
माँ ममता की मूरत है तो पिता त्याग का दरिया
माँ कह देती अपना दुःख तो मौन और गुमसुम है
ऊपर से कठोर मगर पर हदय सौम्य और निश्चल है
माँ ने गर चलना सिखाया तो गिर कर समलना वही सीखता है
हमारे सुख को देख हमेशा वो मंद मंद मुस्काता है
और हमको तो इसमें हमेशा उसका निज श्वार्थ ही नज़र आता है
दुःख में जो साथ हमारे हर वक्त खड़ा नज़र आता है
वही पिता सुख में हमेशा हमसे कही दूर हो जाता है
मैंने भी ये तब माना पास न आपने जब उनको जाना
अब बस हर याद पे उनकी बस इतना ही कहता हु
माँ का प्यार तो दिखता पर पिता का क्यों समझ नहीं पाया मैं
आज बहुत याद आते हूँ आप ....................अभिषेक
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